“शिव बनने से पहले त्याग और आत्मसंयम सीखो पहले”

विनायक एक बीस वर्षीय लड़का था। आधुनिक कॉलेज लाइफ, स्मार्टफोन और इंस्टाग्राम रील्स में डूबा हुआ। उसे लगता था कि दुनिया सिर्फ उसी की तरह सोचती है — तेज़, बिंदास और ‘कूल’।
एक दिन, महाशिवरात्रि के अवसर पर कॉलेज में “शिव-चर्चा” रखी गई थी। प्रेमानंद महाराज विशेष अतिथि थे। पूरे कॉलेज में उत्साह था, लेकिन विनायक को इन बातों में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं थी।
वह अपने दोस्तों के साथ कैंपस के पीछे बैठा हुआ भांग पी रहा था। किसी ने पूछा, “भाई, इतना क्यों पी रहा है?”
विनायक हँसा — “जब शिवजी पीते हैं, तो मैं क्यों नहीं?”
इतने में किसी ने कहा, “चल, महाराज का प्रवचन चल रहा है, थोड़ा मसाला मिलेगा।” सब हँसते हुए वहाँ पहुँच गए।
महाराज बोले —
> “आज कोई मुझसे पूछेगा कि जब शिव नशा करते हैं, तो हम क्यों नहीं?”
विनायक के दोस्तों ने उसे धक्का दिया — “यही मौका है, पूछ न!”
विनायक उठ खड़ा हुआ और सवाल दागा —
“महाराज, अगर भगवान शिव नशा करते हैं, तो हम क्यों नहीं कर सकते?”
सन्नाटा छा गया। महाराज मुस्कुराए, धीरे बोले:
> “बिलकुल कर सकते हो, लेकिन पहले शिव बनो।
जब किसी और का ज़हर पी सको, जब पूरी सृष्टि की रक्षा के लिए खुद को जला सको,
जब गले में नाग, सिर पर चंद्र और मन में शांति हो — तब करना नशा।
लेकिन अगर तुम सिर्फ भागने के लिए पी रहे हो, तो तुम शिव नहीं, सिर्फ भ्रम में खोए मानव हो।”
सारे छात्र मौन हो गए। विनायक की आँखें पहली बार शर्म से झुक गईं।
उस रात, विनायक ने पहली बार बिना नशे के सोने की कोशिश की। नींद नहीं आई, लेकिन अंदर कुछ बदल रहा था।
एक साल बाद…
अब वह सुबह-सुबह उठकर मंदिर जाता है। कॉलेज में “यूथ अगेंस्ट ड्रग्स” अभियान चलाता है। किसी ने पूछा —
“क्यों बदले?”
उसने सिर्फ एक वाक्य कहा —
“क्योंकि मुझे समझ आ गया, मैं शिव नहीं हूँ।”
✨ सीख:
भगवान की शक्तियाँ पूजनीय हैं, पर उनका अनुकरण अंधा नहीं होना चाहिए।
जो हमें मुक्ति की ओर ले जाए, वही शिव है।
बाक़ी सब — मोह है।



