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एक दयालु राजा, जिसकी दो आँखें अलग-अलग रंग की थीं, लोगों के उपहास से दुखी होकर सच्ची सुंदरता और न्याय का महत्व समझा।

राजा की दो आँखें

​बहुत समय पहले की बात है, एक राज्य में एक दयालु और बुद्धिमान राजा राज करता था। वह अपनी प्रजा का बहुत ख्याल रखता था और हमेशा न्याय का पक्ष लेता था। उसके राज्य में सब लोग खुश थे। लेकिन राजा की एक समस्या थी, उसकी दोनों आँखें अलग-अलग रंग की थीं। एक आँख का रंग नीला था और दूसरी आँख का रंग भूरा।

​राज्य के कुछ शरारती और ईर्ष्यालु लोगों को यह बात अच्छी नहीं लगती थी। उन्होंने राजा को नीचा दिखाने के लिए उसका मजाक उड़ाना शुरू कर दिया। वे राजा के पीछे-पीछे चलते और कहते, “देखो, हमारे राजा की आँखें कितनी अजीब हैं! उनकी एक आँख नीली है और दूसरी भूरी।”

​यह बात धीरे-धीरे पूरे राज्य में फैल गई। जब राजा को इस बारे में पता चला तो उसे बहुत दुख हुआ। उसने सोचा, “मेरी आँखें अलग-अलग हैं, इसमें मेरी क्या गलती है? क्या मैं अपनी प्रजा की भलाई के लिए काफी नहीं हूँ?”

​राजा ने अपने दरबारियों को बुलाया और उनसे कहा, “मेरे दरबारियों, मेरी आँखों का मजाक उड़ाया जा रहा है। मुझे लगता है कि मैं अपनी प्रजा को पसंद नहीं हूँ। क्या मुझे अपना राजपाठ छोड़ देना चाहिए?”

​राजा के सबसे बुद्धिमान और वफादार मंत्री ने राजा से कहा, “महाराज, आप इतने अच्छे शासक हैं। आपकी आँखों का रंग कोई मायने नहीं रखता। आपकी सबसे बड़ी सुंदरता आपकी दयालुता और आपका न्याय है।”

​राजा ने मंत्री की बात सुनी, लेकिन फिर भी वह उदास रहा। वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे।

​एक दिन, एक बहुत ही ज्ञानी साधु राज्य में आया। उसने लोगों की बातें सुनीं और राजा की उदासी को महसूस किया। वह राजा के पास गया और उससे कहा, “हे राजन, आप इतने उदास क्यों हैं? आपकी आँखों का रंग अलग है, इसमें कौन सी बड़ी बात है? यह तो ईश्वर का बनाया हुआ एक चमत्कार है।”

​राजा ने साधु से पूछा, “महाराज, लोग मेरी आँखों का मजाक उड़ाते हैं। वे मुझे पसंद नहीं करते। मुझे क्या करना चाहिए?”

​साधु मुस्कुराया और बोला, “महाराज, आपकी आँखें भले ही अलग-अलग रंग की हैं, लेकिन वे दोनों एक ही जगह देखती हैं। वे दोनों एक ही लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करती हैं: आपकी प्रजा की भलाई। एक आँख नीले आकाश को देखती है और दूसरी भूरी धरती को। आप अपनी एक आँख से ईश्वर की विशालता देखते हैं और दूसरी से मनुष्य की विनम्रता। यह तो एक वरदान है, अभिशाप नहीं।”

​साधु की बात सुनकर राजा की आँखें खुल गईं। उसे समझ में आ गया कि उसकी आँखों का अलग रंग उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति है। उसने साधु को प्रणाम किया और उसे धन्यवाद दिया।

​उस दिन के बाद, राजा ने फिर कभी अपनी आँखों के बारे में बुरा नहीं सोचा। उसने और भी अधिक उत्साह से अपने राज्य का शासन करना शुरू कर दिया। जब लोगों ने उसकी आँखों का मजाक उड़ाने की कोशिश की, तो वह मुस्कुरा कर कहता, “मेरी आँखें अलग-अलग रंग की हैं, लेकिन वे दोनों एक ही चीज़ देखती हैं: आपकी खुशी।”

​यह सुनकर लोगों को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने राजा से माफ़ी माँगी और उसकी दयालुता और बुद्धिमत्ता की प्रशंसा की। राजा ने उन्हें माफ़ कर दिया और कहा, “मनुष्य की सच्ची सुंदरता उसके दिल में होती है, न कि उसकी सूरत में।”

​इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें लोगों को उनके बाहरी रूप से नहीं, बल्कि उनके आंतरिक गुणों से पहचानना चाहिए। हर इंसान अपने आप में खास होता है, और हमें उसकी अच्छाइयों को देखना चाहिए।

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