चीन को धमकाया तो अमेरिका की खैर नहीं

चीन को धमकाया तो अमेरिका की खैर नहीं
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इस समय तनाव लगातार बढ़ रहा है। खासकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की नीतियों को लेकर भारत और चीन दोनों देशों ने साफ संदेश दिया है कि अगर वॉशिंगटन ने धमकाने की कोशिश की, तो इसके गंभीर नतीजे होंगे। यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका लगातार टैरिफ, व्यापारिक दबाव और सैन्य रणनीतियों के जरिए एशियाई देशों पर अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
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भारत की सख्त चेतावनी
भारत ने हाल ही में साफ किया कि वह अपनी आर्थिक और रणनीतिक स्वतंत्रता से कोई समझौता नहीं करेगा।
विदेश मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि भारत किसी भी तरह के दबाव को स्वीकार नहीं करेगा।
अमेरिका के टैरिफ और आयात नीतियों के खिलाफ भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि जरूरत पड़ी तो वैकल्पिक बाजार और साझेदारियां तलाश ली जाएंगी।
प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्रालय की ओर से यह भी दोहराया गया है कि भारत अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा करने में सक्षम है।
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चीन का रुख
चीन ने भी अमेरिका को दो टूक कहा है कि वह एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपनी दादागिरी बंद करे।
बीजिंग ने चेतावनी दी कि यदि अमेरिका ने धमकाने की नीति जारी रखी, तो इसके गंभीर भू-राजनीतिक परिणाम सामने आएंगे।
चीन ने साफ किया कि वह किसी भी तरह के दबाव में नहीं आने वाला और अपने आर्थिक व सैन्य हितों की रक्षा करेगा।
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अमेरिका पर सीधा असर
अगर भारत और चीन दोनों मिलकर अमेरिका की नीतियों का विरोध करते हैं, तो इसका असर न सिर्फ राजनीतिक बल्कि आर्थिक स्तर पर भी बड़ा होगा।
भारत और चीन मिलकर दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और बड़ा बाजार रखते हैं।
दोनों देशों की आर्थिक ताकत अमेरिका की कंपनियों और निर्यातकों के लिए बेहद अहम है।
अगर व्यापार और आयात-निर्यात में रुकावटें आईं तो अमेरिका की GDP पर सीधा असर पड़ सकता है।
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विशेषज्ञों की राय
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि भारत और चीन के एक साथ खड़े होने से अमेरिका को रणनीतिक मोर्चे पर चुनौती मिलेगी।
रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि अगर वॉशिंगटन अपनी नीतियों में लचीलापन नहीं दिखाता, तो उसे लंबे समय में एशिया से पीछे हटना पड़ सकता है।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों देशों की ओर से सख्त रुख अपनाने का असर ग्लोबल मार्केट और निवेश माहौल पर भी पड़ेगा।
भारत और चीन का यह सख्त रुख बताता है कि अब अमेरिका के लिए पुरानी रणनीति अपनाना आसान नहीं रहेगा। एशियाई देश अब अपनी आर्थिक और सामरिक ताकत के आधार पर वैश्विक स्तर पर अमेरिका को चुनौती देने में सक्षम हो चुके हैं।



