
🪔 अनोखी परंपरा: मिर्जापुर के गांवों में दीपावली पर नहीं जलते दीये, पृथ्वीराज चौहान की याद में मनाते हैं शोक
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर ज़िले के राजगढ़ क्षेत्र के कई गांवों में दीपावली का त्योहार रौशनी नहीं, बल्कि शोक का प्रतीक बन जाता है। जहां पूरे देश में दीपों की जगमगाहट होती है, वहीं मिर्जापुर के इन गांवों के घर अंधेरे में डूबे रहते हैं।
यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है, जब दिल्ली के वीर सम्राट पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद उनके वंशजों ने शोक के प्रतीक के रूप में दीपावली पर दीये न जलाने की प्रतिज्ञा ली थी। यह परंपरा आज भी बरकरार है।
कहां मनाया जाता है यह शोक
मिर्जापुर के राजगढ़ तहसील के अतरही, बभनी, भरूहना, मटिहानी, अमहिया और लहरौली जैसे गांवों में यह परंपरा आज भी जीवित है। इन गांवों में चौहान वंश के क्षत्रिय परिवार रहते हैं, जो दीपावली के दिन अपने घरों में न तो दीये जलाते हैं, न मिठाइयां बनती हैं, न ही पटाखे फोड़े जाते हैं।
लोग इस दिन काले कपड़े पहनते हैं, मांसाहार और मदिरा से दूर रहते हैं, और अपने वीर पूर्वजों की वीरगाथाओं का स्मरण करते हैं। यह उनका उस राजा के प्रति श्रद्धांजलि है, जिसने विदेशी आक्रमणकारियों से भारत की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
परंपरा के पीछे की कहानी
स्थानीय बुज़ुर्गों के अनुसार, जब पृथ्वीराज चौहान को मुहम्मद गौरी ने धोखे से बंदी बनाकर अफगानिस्तान ले जाया था, तब उनके परिजनों और अनुयायियों ने दीपावली न मनाने की कसम खाई थी।
उस समय दीपावली नजदीक थी, लेकिन चौहान वंश के लोगों ने कहा —
> “जिस घर का दीप बुझ गया, उस घर में दीपावली कैसे होगी।”
उस दिन से लेकर आज तक यह परंपरा लगभग 800 वर्षों से जारी है।
🏠 गांवों का माहौल
दीपावली की रात जब पूरा मिर्जापुर जगमगा उठता है, तब इन गांवों में सन्नाटा और अंधेरा छाया रहता है। बच्चे बाहर खेलते जरूर हैं, लेकिन कोई भी दीया जलाने या पटाखा फोड़ने की हिम्मत नहीं करता।
लोग बताते हैं कि “हमारे पुरखों ने यह परंपरा शुरू की थी, और हम इसे निभाते रहेंगे। यह हमारे लिए त्योहार नहीं, वीरता और त्याग की याद का दिन है।”
🕯️ नई पीढ़ी की सोच
हालांकि, अब कुछ युवा चाहते हैं कि इस परंपरा को “श्रद्धांजलि के साथ रौशनी में बदला जाए।” उनका मानना है कि दीया जलाना वीरता का प्रतीक हो सकता है।
लेकिन बुज़ुर्ग अब भी कहते हैं, “जब तक हम जिंदा हैं, चौहान वंश का दीप अंधेरे में रहेगा, क्योंकि यह शोक की दीपावली है, न कि उत्सव की।”
📜 इतिहासकारों की दृष्टि
इतिहासकारों का मानना है कि पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद उत्तर भारत के कई चौहान वंशज परिवारों ने इसी तरह के शोक पर्व शुरू किए थे, पर समय के साथ वे खत्म हो गए।
लेकिन मिर्जापुर के इन गांवों ने इस परंपरा को आज तक संभाल कर रखा है, जो उनकी संस्कृति और निष्ठा का उदाहरण है।
🌾 समाज में संदेश
यह परंपरा केवल शोक नहीं, बल्कि बलिदान की भावना का प्रतीक है। यह बताती है कि दीपावली सिर्फ रोशनी का नहीं, बल्कि इतिहास और स्मृति का पर्व भी हो सकता है।
लेखक टिप्पणी:
मिर्जापुर की यह परंपरा भारत की उन दुर्लभ सांस्कृतिक विरासतों में से एक है, जो सदियों से अपने मूल्यों और इतिहास को संभाले हुए हैं। अंधेरे में भी एक गौरव की ज्योति छिपी है — पृथ्वीराज चौहान की अमर गाथा की।
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स्थान: राजगढ़ क्षेत्र, मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश)
🗓️ परंपरा की शुरुआत: 12वीं सदी के बाद
🕯️ मुख्य गांव: अतरही, बभनी, भरूहना, मटिहानी, अमहिया, लहरौली



