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शरद पवार ने चाहा होता तो पूरा हो जाता अजित दादा का सपना,

मगर अब हमेशा के लिए अधूरा रह गया ख्वाब

निरुपमा पाण्डेय | जस्ट एक्शन न्यूज़

महाराष्ट्र की राजनीति में दशकों से प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले शरद पवार एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार वजह है उनके भतीजे अजित पवार का अधूरा रह गया वह सपना, जिसे अगर शरद पवार चाहते तो शायद बहुत पहले साकार किया जा सकता था। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल अब ज़ोर पकड़ रहा है कि क्या अजित पवार को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने से रोकने में सबसे बड़ी भूमिका उनके ही चाचा की रही?
सत्ता के करीब आकर भी दूर रह गए अजित पवार
अजित पवार लंबे समय से महाराष्ट्र की राजनीति में एक मजबूत नेता माने जाते रहे हैं। उपमुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने कई बार राज्य की सत्ता संभाली, लेकिन मुख्यमंत्री बनने का सपना हमेशा अधूरा रह गया। 2019 में जब उन्होंने बीजेपी के साथ अचानक सरकार बनाने की कोशिश की थी, तब लगा था कि उनका सपना पूरा होने ही वाला है। लेकिन शरद पवार की रणनीतिक चालों ने पूरे खेल को पलट दिया।
एनसीपी को एकजुट कर शरद पवार ने न सिर्फ अजित पवार को अलग-थलग किया, बल्कि शिवसेना और कांग्रेस के साथ महाविकास अघाड़ी सरकार बनाकर सत्ता अपने खेमे में वापस ले आए।
क्या शरद पवार नहीं चाहते थे अजित का उभार?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शरद पवार हमेशा पार्टी की कमान अपने हाथ में रखना चाहते थे। उन्हें यह डर भी सता रहा था कि अगर अजित पवार मुख्यमंत्री बन गए, तो एनसीपी में सत्ता का केंद्र बदल सकता है।
कई मौकों पर शरद पवार ने अजित पवार को खुला समर्थन देने के बजाय संतुलन की राजनीति की। यही वजह रही कि पार्टी के भीतर अजित पवार को कभी पूरी तरह फ्री हैंड नहीं मिला।
बगावत और टूट की कहानी
2023 में अजित पवार ने एक बार फिर बड़ा राजनीतिक दांव खेलते हुए बीजेपी-शिवसेना सरकार में शामिल होकर उपमुख्यमंत्री पद संभाल लिया। इसके साथ ही एनसीपी में बड़ी टूट हुई। हालांकि इस कदम से उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी तो मिली, लेकिन मुख्यमंत्री बनने का रास्ता फिर भी नहीं खुल सका।
उधर शरद पवार ने पार्टी के असली उत्तराधिकारी के तौर पर अपनी बेटी सुप्रिया सुले को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया, जिससे साफ हो गया कि भविष्य की राजनीति में अजित पवार उनकी पहली पसंद नहीं हैं।
अब हमेशा के लिए दूर होता सपना?
बदलते राजनीतिक समीकरणों और उम्र के बढ़ते पड़ाव को देखते हुए यह माना जा रहा है कि अजित पवार का मुख्यमंत्री बनने का सपना अब लगभग अधूरा ही रह जाएगा। बीजेपी में शामिल होकर भी उन्हें वह सर्वोच्च पद नहीं मिल पाया, जिसकी उन्हें वर्षों से उम्मीद थी।
राजनीतिक जानकार कहते हैं कि अगर शरद पवार ने समय रहते अजित पवार को पार्टी का चेहरा बना दिया होता, तो आज तस्वीर कुछ और होती। लेकिन रणनीति, नियंत्रण और पारिवारिक संतुलन की राजनीति ने अजित पवार के रास्ते में दीवार बनकर खड़ी हो गई।
निष्कर्ष
महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार को मास्टर स्ट्रैटेजिस्ट माना जाता है, लेकिन उसी रणनीति की सबसे बड़ी कीमत शायद उनके भतीजे अजित पवार को चुकानी पड़ी। सत्ता के इतने करीब पहुंचकर भी मुख्यमंत्री की कुर्सी से दूर रह जाना, अजित पवार के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा अधूरा सपना बन गया है।
अब सवाल यही है — क्या यह सब राजनीति की मजबूरी थी या शरद पवार की सोची-समझी चाल? जवाब आने वाले सालों में महाराष्ट्र की राजनीति खुद

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