संसद में CEC के खिलाफ महाभियोग की चर्चा तेज, ममता बनर्जी का समर्थन; जानिए मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की पूरी संवैधानिक प्रक्रिया

नई दिल्ली।
देश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा संवैधानिक मुद्दा चर्चा के केंद्र में आ गया है। संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के खिलाफ महाभियोग लाने की अटकलें तेज हो गई हैं। इस बीच पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विपक्षी दलों के रुख का समर्थन करते हुए चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही तय होना जरूरी है।
सूत्रों के मुताबिक, कुछ विपक्षी सांसद कथित पक्षपात और चुनावी प्रक्रियाओं में अनियमितताओं के आरोपों को लेकर CEC के खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि अभी तक सरकार की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
ममता बनर्जी का बड़ा बयान
ममता बनर्जी ने कहा,
“अगर संवैधानिक पदों पर बैठे लोग निष्पक्षता नहीं निभाते, तो संसद को हस्तक्षेप करने का पूरा अधिकार है। लोकतंत्र किसी एक संस्था की जागीर नहीं है।”
उनके इस बयान के बाद विपक्षी खेमे में हलचल तेज हो गई है और कई दल खुलकर चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाने लगे हैं।
CEC को हटाने की क्या है पूरी संवैधानिक प्रक्रिया?
भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना आसान नहीं है। संविधान उन्हें सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान सुरक्षा प्रदान करता है, ताकि वे बिना किसी राजनीतिक दबाव के काम कर सकें।
प्रक्रिया कुछ इस तरह होती है:
महाभियोग प्रस्ताव की शुरुआत
संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर से प्रस्ताव लाया जाता है।
स्पीकर/सभापति की मंजूरी
लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा सभापति प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करते हैं।
जांच समिति का गठन
अगर प्रस्ताव स्वीकार हो जाए, तो एक विशेष जांच समिति बनाई जाती है जो आरोपों की जांच करती है।
रिपोर्ट संसद में पेश
समिति अगर आरोप सही पाती है, तो अपनी रिपोर्ट संसद में रखती है।
दोनों सदनों से विशेष बहुमत जरूरी
CEC को हटाने के लिए लोकसभा और राज्यसभा—दोनों में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास होना अनिवार्य है।
राष्ट्रपति की मंजूरी
संसद से मंजूरी के बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से CEC को पद से हटाया जाता है।
क्यों इतना कठिन है CEC को हटाना?
संविधान निर्माताओं ने यह प्रावधान इसलिए रखा ताकि चुनाव आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष रह सके तथा किसी भी सरकार के दबाव में न आए।
आगे क्या?
फिलहाल महाभियोग को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी तेज है, लेकिन प्रस्ताव वास्तव में संसद में आएगा या नहीं, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। अगर ऐसा हुआ तो यह भारत के संवैधानिक इतिहास की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक मानी जाएगी।
निरुपमा पाण्डेय
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