
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत मामलों में पारदर्शिता को लेकर अहम निर्देश जारी करते हुए कहा है कि किसी भी आरोपी को जमानत याचिका दाखिल करते समय अपना पूरा आपराधिक इतिहास स्पष्ट रूप से बताना अनिवार्य होगा। अदालत ने साफ किया कि लंबित मामलों, पूर्व में दर्ज एफआईआर, आरोपपत्र और पहले मिली जमानत की जानकारी छिपाना न्याय प्रक्रिया के साथ छल के समान है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि जमानत पर फैसला करते समय न्यायालय के लिए यह जानना आवश्यक है कि आरोपी का आपराधिक रिकॉर्ड क्या रहा है। यदि कोई तथ्य छिपाया जाता है तो इससे न्यायालय गुमराह हो सकता है और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है। इसलिए याचिकाकर्ता और उसके वकील दोनों की जिम्मेदारी है कि सभी प्रासंगिक तथ्य सत्य और संपूर्ण रूप में प्रस्तुत किए जाएं।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जानकारी छिपाने पर संबंधित व्यक्ति के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है, जिसमें जमानत रद्द करना भी शामिल है। अदालत ने निचली अदालतों को निर्देश दिया कि वे जमानत याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आपराधिक इतिहास का उल्लेख सुनिश्चित करें और रिकॉर्ड का सत्यापन भी करें।
इस आदेश को न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इससे बार-बार अपराध करने वालों पर निगरानी मजबूत होगी और अदालतों को निष्पक्ष निर्णय लेने में मदद मिलेगी। Poonam Report



