नई दिल्ली। दशहरा और दिवाली से पहले रोजमर्रा की जरूरत वाली चीजों की बढ़ती लागत का असर अब पैकेट के आकार और कीमत दोनों पर दिखाई देने लगा है। कंपनियां छोटे पैक की कीमत को यथासंभव पहले जैसा रखते हुए उनमें सामान की मात्रा कम कर रही हैं, जबकि बड़े पैक की कीमत में सीधे बढ़ोतरी की जा रही है। इससे ग्राहकों को एक ही कीमत में पहले की तुलना में कम सामान मिल रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार कई छोटे पैक में सामान की मात्रा करीब 2 से 7 फीसदी तक घटाई जा रही है। वहीं बड़े पैक, खासकर एक किलो या उससे अधिक वाले पैक में करीब 5 से 6 फीसदी तक कीमत बढ़ाई जा रही है। यह बदलाव बिस्कुट, नमकीन, स्नैक्स, नूडल्स, हेयर ऑयल, साबुन, शैंपू, डिटर्जेंट, चीनी और चाय जैसी रोजमर्रा की वस्तुओं में देखने को मिल रहा है।
कंपनियों के सामने कच्चे माल और उत्पादन लागत बढ़ने की चुनौती है। पाम ऑयल, पैकेजिंग और अन्य जरूरी जिंसों की कीमतों में बढ़ोतरी से लागत पर दबाव बढ़ा है। ऐसे में कंपनियां कीमत सीधे बढ़ाने के बजाय छोटे पैक में मात्रा घटाने की रणनीति अपना रही हैं, ताकि 10, 20 और 50 रुपये जैसे लोकप्रिय मूल्य वाले पैक ग्राहकों को महंगे न लगें।
बड़े पैक में कंपनियों के लिए कीमत बढ़ाने की गुंजाइश अधिक रहती है। इसलिए बड़े पैक में बढ़ी लागत का कुछ हिस्सा सीधे कीमत बढ़ाकर ग्राहकों से वसूला जा रहा है। इसका मतलब है कि ग्राहकों पर असर सिर्फ महंगे सामान के रूप में नहीं, बल्कि समान कीमत में कम मात्रा मिलने के रूप में भी पड़ रहा है।
त्योहारी सीजन में दूध और घी जैसे डेयरी उत्पादों की लागत पर भी दबाव बना हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक दूध की कीमत में प्रति लीटर कुछ बढ़ोतरी की संभावना जताई गई है, जबकि घी की कीमत पहले ही बढ़ चुकी है। त्योहारों के दौरान दूध, घी और अन्य खाद्य उत्पादों की मांग बढ़ने से परिवारों के बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
महंगाई के बीच ग्राहक भी अपनी खरीदारी का तरीका बदल रहे हैं। कई परिवार बड़े पैक के बजाय छोटे पैक खरीदकर खर्च को अलग-अलग समय में बांट रहे हैं। इससे कंपनियों के लिए छोटे मूल्य वाले पैक महत्वपूर्ण बने हुए हैं, लेकिन मात्रा कम होने के कारण ग्राहकों के लिए प्रति यूनिट वास्तविक लागत बढ़ सकती है।
ग्राहकों के लिए ऐसे समय में केवल पैकेट की कीमत देखना पर्याप्त नहीं है। पैकेट पर लिखी नेट मात्रा और प्रति किलो या प्रति लीटर कीमत की तुलना करने से यह पता लगाया जा सकता है कि वास्तव में कौन सा पैक अधिक किफायती है। सरकार का उपभोक्ता मामलों का विभाग भी पैक के आकार और कीमतों की तुलना आसान बनाने के लिए मानक पैक आकार जैसे उपायों पर काम कर रहा है।
महंगाई के इस दौर में कंपनियां अपनी लागत और बिक्री के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं, जबकि ग्राहकों के सामने कम मात्रा और बढ़ती कीमतों के बीच अपने घरेलू बजट को संभालने की चुनौती है।
Poonam Report.



