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जब नेहरू ने फील्ड मार्शल करियप्पा को लिखा – ‘नाच-गाने की व्यवस्था करो’, निशिकांत दुबे ने शेयर की चिट्ठी, फिर छिड़ा सियासी घमासान

नई दिल्ली
। देश की राजनीति में एक बार फिर इतिहास से जुड़ा पत्र चर्चा का केंद्र बन गया है। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने भारत के पहले कमांडर-इन-चीफ फील्ड मार्शल के.एम. करियप्पा को पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखा गया एक पुराना पत्र सोशल मीडिया पर साझा किया है। इस पत्र में कथित तौर पर नेहरू ने करियप्पा से किसी आयोजन के दौरान “नाच-गाने की व्यवस्था” करने का उल्लेख किया था।
निशिकांत दुबे ने पत्र शेयर करते हुए लिखा कि आजादी के बाद सेना और सत्ता के संबंधों को किस तरह देखा जाता था, यह इस चिट्ठी से साफ झलकता है। उन्होंने इसे तत्कालीन राजनीतिक सोच का उदाहरण बताया और कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि सेना को सम्मान देने की बजाय उसे मनोरंजन तक सीमित रखने की मानसिकता थी।

क्या है चिट्ठी में?

सोशल मीडिया पर वायरल हो रही इस चिट्ठी में जवाहरलाल नेहरू कथित रूप से फील्ड मार्शल करियप्पा को किसी विशेष कार्यक्रम या दौरे के दौरान सांस्कृतिक आयोजन की व्यवस्था करने के निर्देश देते नजर आते हैं। पत्र का लहजा औपचारिक है, लेकिन “नाच-गाने” जैसे शब्दों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
बीजेपी नेताओं का कहना है कि यह पत्र उस दौर की सत्ता की प्राथमिकताओं को दिखाता है, जबकि कांग्रेस समर्थक इसे संदर्भ से काटकर पेश करने का आरोप लगा रहे हैं।

राजनीतिक बयानबाजी तेज

निशिकांत दुबे के पोस्ट के बाद कई बीजेपी नेताओं ने कांग्रेस पर हमला बोला। उनका कहना है कि आज की सरकार जहां सेना को सर्वोच्च सम्मान देती है, वहीं पहले के शासक उसे केवल औपचारिक आयोजनों तक सीमित समझते थे।
वहीं कांग्रेस नेताओं ने पलटवार करते हुए कहा कि यह इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की कोशिश है। उनका तर्क है कि किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम की व्यवस्था करना अपमान नहीं बल्कि उस दौर की सामान्य परंपरा थी।
इतिहास से राजनीति तक

फील्ड मार्शल के.एम. करियप्पा भारतीय सेना के सबसे सम्मानित अधिकारियों में गिने जाते हैं। उन्होंने देश की आजादी के बाद सेना के संगठन और मजबूती में अहम भूमिका निभाई थी। ऐसे में उनसे जुड़ा कोई भी ऐतिहासिक दस्तावेज सामने आते ही राजनीतिक रंग लेना तय माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनावी माहौल के बीच इस तरह के ऐतिहासिक पत्रों को सामने लाकर भावनात्मक मुद्दे उठाए जा रहे हैं, जिससे मौजूदा राजनीतिक बहस को धार मिल सके।

सोशल मीडिया पर भी बंटा देश

पत्र सामने आते ही सोशल मीडिया पर लोग दो खेमों में बंट गए हैं। एक वर्ग इसे नेहरू सरकार की सोच का प्रमाण बता रहा है, जबकि दूसरा वर्ग इसे बेवजह का विवाद करार दे रहा है।
फिलहाल यह साफ है कि एक पुरानी चिट्ठी ने वर्तमान राजनीति में नया तूफान खड़ा कर दिया है — और आने वाले दिनों में इस पर बयानबाजी और तेज होने के आसार हैं।
निरुपमा पाण्डेय
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