पुलवामा हमले के 7 साल: आतंक के बदलते चेहरे की चुनौती, बदली सुरक्षा व्यवस्था से नकेल; अब संयुक्त रणनीति पर काम

पुलवामा में 2019 में हुए आतंकी हमले को सात वर्ष पूरे हो चुके हैं। उस घटना ने देश की सुरक्षा व्यवस्था, खुफिया तंत्र और आतंकवाद से निपटने की रणनीति को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया था। बीते वर्षों में सुरक्षा एजेंसियों ने अपने तौर-तरीकों में व्यापक बदलाव किए हैं।
बदला आतंक का स्वरूप
सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, आतंक का तरीका पहले की तुलना में अधिक तकनीकी और बिखरे नेटवर्क वाला हो गया है। सोशल मीडिया, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग और छोटे मॉड्यूल के जरिए गतिविधियां संचालित करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इससे पारंपरिक निगरानी तंत्र को चुनौती मिली है।
सुरक्षा ढांचे में सुधार
हमले के बाद क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था को बहुस्तरीय बनाया गया।
संवेदनशील मार्गों पर काफिला प्रबंधन प्रणाली मजबूत की गई।
स्थानीय खुफिया इनपुट जुटाने की प्रक्रिया तेज की गई।
केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाया गया।
संयुक्त रणनीति पर फोकस
सुरक्षा एजेंसियां अब संयुक्त ऑपरेशन, रियल-टाइम इंटेलिजेंस शेयरिंग और तकनीकी निगरानी पर अधिक जोर दे रही हैं। ड्रोन निगरानी, डेटा विश्लेषण और साइबर ट्रैकिंग जैसे आधुनिक साधनों का उपयोग बढ़ा है।
स्थानीय सहयोग की भूमिका
विशेषज्ञ मानते हैं कि आतंकवाद से निपटने में स्थानीय समुदाय का विश्वास और सहयोग महत्वपूर्ण है। युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने, रोजगार और शिक्षा के अवसर बढ़ाने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं।
सात साल बाद सुरक्षा परिदृश्य में कई बदलाव दिखते हैं, लेकिन बदलते आतंक के तरीकों को देखते हुए सतर्कता और समन्वित रणनीति की आवश्यकता लगातार बनी हुई है। Poonam Report



