
नई दिल्ली
भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और इसका आधार है भारतीय संविधान। लेकिन जब संविधान की बात होती है, तो अक्सर कुछ गिने-चुने पुरुष नेताओं के नाम ही सामने आते हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत के संविधान निर्माण में महिलाओं की भी ऐतिहासिक और निर्णायक भूमिका रही। गणतंत्र की नींव रखने वाली इन महिलाओं को ही सही मायनों में भारत की असली नायिकाएं कहा जाना चाहिए।
संविधान सभा में थीं 15 महिला सदस्य
1946 में गठित संविधान सभा में कुल 299 सदस्य थे, जिनमें 15 महिलाएं शामिल थीं। उस दौर में जब महिलाओं को समान अधिकार भी पूरी तरह हासिल नहीं थे, तब इन महिलाओं का संविधान सभा में होना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी।
हंसा मेहता: समानता की मजबूत आवाज
हंसा मेहता ने संविधान सभा में महिलाओं के समान अधिकार की जोरदार पैरवी की। उन्होंने यह सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाई कि संविधान में “पुरुष” की जगह “सभी व्यक्ति” शब्द का प्रयोग हो, जिससे महिलाओं को भी समान अधिकार मिल सकें।
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार घोषणा-पत्र में भी उनके सुझावों का असर दिखा।
दक्षायणी वेलायुधन: दलित महिलाओं की प्रतिनिधि
दक्षायणी वेलायुधन संविधान सभा की एकमात्र दलित महिला सदस्य थीं। उन्होंने छुआछूत, सामाजिक भेदभाव और उत्पीड़न के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई। उनका मानना था कि संविधान तभी सफल होगा, जब समाज के सबसे कमजोर वर्ग को न्याय मिलेगा।
अम्मू स्वामीनाथन: नागरिक स्वतंत्रता की पैरोकार
अम्मू स्वामीनाथन ने नागरिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों पर जोर दिया। उन्होंने कहा था कि आज़ादी का मतलब केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समानता भी है।
बेगम एजाज रसूल: मुस्लिम महिलाओं की आवाज
बेगम एजाज रसूल ने अल्पसंख्यक अधिकारों और महिला सशक्तिकरण को लेकर महत्वपूर्ण सुझाव दिए। वे चाहती थीं कि संविधान हर धर्म और वर्ग की महिलाओं को समान सुरक्षा दे।
राजकुमारी अमृत कौर: स्वास्थ्य और सामाजिक सुधार
राजकुमारी अमृत कौर ने संविधान में स्वास्थ्य, महिला कल्याण और सामाजिक सुधार से जुड़े मुद्दों पर मजबूत राय रखी। आज़ाद भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री भी वही बनीं।
आज भी प्रासंगिक है इन महिलाओं की सोच
इन महिला सदस्यों की वजह से ही आज भारतीय संविधान में समानता, स्वतंत्रता और न्याय जैसे मूल सिद्धांत मजबूती से मौजूद हैं।
गणतंत्र दिवस 2026 के मौके पर यह याद रखना जरूरी है कि भारत का संविधान केवल पुरुष नेताओं की देन नहीं, बल्कि इसमें महिलाओं की दूरदृष्टि, संघर्ष और विचारों की भी मजबूत छाप है।
गणतंत्र की सच्ची नायिकाएं
संविधान सभा की ये महिलाएं सिर्फ सदस्य नहीं थीं, बल्कि वे उस भारत की कल्पना कर रही थीं, जहां लिंग, जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव न हो। यही वजह है कि आज भी उनका योगदान प्रेरणा देता है।
पूनम रिपोर्ट



