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कौन थे मुकुल रॉय?: टीएमसी के संस्थापक से ममता के रणनीतिकार तक, बंगाल की राजनीति के ‘चाणक्य’ ने ली अंतिम सांस

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति के प्रमुख चेहरों में शुमार और तृणमूल कांग्रेस के संस्थापक नेताओं में से एक Mukul Roy ने अंतिम सांस ली। उनके निधन से राज्य की राजनीति में एक युग का अंत माना जा रहा है। संगठन खड़ा करने से लेकर चुनावी रणनीति बनाने तक, उन्होंने पर्दे के पीछे रहकर बड़ी राजनीतिक बिसातें बिछाईं।

टीएमसी की नींव में अहम भूमिका

साल 1998 में जब Mamata Banerjee ने कांग्रेस से अलग होकर All India Trinamool Congress (टीएमसी) की स्थापना की, तब मुकुल रॉय शुरुआती और भरोसेमंद सहयोगियों में शामिल थे। संगठन विस्तार, बूथ स्तर की संरचना और कार्यकर्ताओं को जोड़ने में उनकी भूमिका निर्णायक रही।

‘रणनीतिकार’ की पहचान

मुकुल रॉय को बंगाल की राजनीति का ‘चाणक्य’ कहा जाता था। 2009 के लोकसभा चुनाव और 2011 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी की ऐतिहासिक जीत के पीछे उनकी रणनीति को अहम माना गया।

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चुनावी गणित और सामाजिक समीकरण
इन सभी में उनकी गहरी पकड़ थी।

केंद्र की राजनीति में भी सक्रिय

टीएमसी के बढ़ते कद के साथ मुकुल रॉय राष्ट्रीय राजनीति में भी सक्रिय हुए। वे राज्यसभा सदस्य रहे और रेल मंत्रालय में केंद्रीय राज्य मंत्री के रूप में भी कार्य किया। पार्टी के भीतर संगठनात्मक जिम्मेदारियों के कारण उन्हें दिल्ली और कोलकाता के बीच संतुलन साधने वाला नेता माना जाता था।

राजनीतिक उतार-चढ़ाव

समय के साथ पार्टी के भीतर मतभेद उभरे और उन्होंने अलग राह पकड़ी। कुछ समय बाद वे अन्य राजनीतिक दल में शामिल हुए, जिससे बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला। हालांकि बाद में उन्होंने फिर वापसी की, जो राज्य की सियासत में एक अहम घटनाक्रम माना गया।

व्यक्तिगत छवि

मुकुल रॉय को शांत, कम बोलने वाले लेकिन बेहद प्रभावी रणनीतिकार के रूप में जाना जाता था। कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पकड़ मजबूत थी और वे जमीनी राजनीति की बारीक समझ रखते थे।

उनके निधन पर राजनीतिक दलों के नेताओं ने शोक व्यक्त किया और बंगाल की राजनीति में उनके योगदान को याद किया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुकुल रॉय का योगदान आने वाले वर्षों तक पश्चिम बंगाल की सियासत में चर्चा का विषय बना रहेगा।

(Poonam Report)

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