नई दिल्ली। भारत की आर्थिक वृद्धि दर को लेकर चल रही बहस के बीच वर्ल्ड बैंक के कार्यकारी निदेशक नीलकंठ मिश्रा ने 2.6 प्रतिशत GDP ग्रोथ के दावे को खारिज किया है। उन्होंने ऐसे दावों को “अशिक्षित” और “बेहद गलत” बताते हुए कहा कि उपलब्ध आर्थिक संकेतक भारत की अर्थव्यवस्था में मजबूत गतिविधियों की ओर इशारा कर रहे हैं।
दरअसल, भारत की नई GDP सीरीज जारी होने के बाद आर्थिक आंकड़ों को लेकर बहस तेज हुई है। सरकार के नए आंकड़ों के अनुसार चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में भारत की वास्तविक GDP वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही। इसके बाद पूर्व वित्त सचिव एससी गर्ग समेत कुछ विशेषज्ञों ने आधार वर्ष और पुराने आंकड़ों में हुए बदलाव को लेकर सवाल उठाए। गर्ग का तर्क था कि अगर पुराने आधार आंकड़ों को बरकरार रखा जाता तो वृद्धि दर करीब 2.6 प्रतिशत दिखाई देती।
नीलकंठ मिश्रा ने इस गणना को ही गलत बताया। उन्होंने कहा कि फरवरी 2026 में नई राष्ट्रीय लेखा श्रृंखला लागू की गई थी, जिसमें आंकड़ों के स्रोत और गणना की पद्धति में सुधार किया गया है। उनके अनुसार आधार में किए गए संशोधन की जानकारी मार्च में ही उपलब्ध थी और इसे GDP वृद्धि को कृत्रिम रूप से बढ़ाने के लिए किया गया बदलाव मानना सही नहीं है।
मिश्रा ने यह भी कहा कि अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति को केवल GDP के आंकड़े से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने वाहन बिक्री, टैक्स कलेक्शन, बैंक क्रेडिट और निर्माण गतिविधियों जैसे ऐसे संकेतकों का हवाला दिया जिन्हें बड़े पैमाने पर आंकड़ों में हेरफेर करके प्रभावित करना मुश्किल है। उनके मुताबिक इन संकेतकों में मजबूती आर्थिक गतिविधियों की बेहतर स्थिति की ओर इशारा करती है।
उनका अनुमान है कि राजकोषीय दबाव कम होने और कर्ज वृद्धि में सुधार आने से भारत की आर्थिक वृद्धि आगे भी मजबूत रह सकती है। उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में भारत की ट्रेंड ग्रोथ का अनुमान 7 प्रतिशत से ऊपर जा सकता है और सामान्य राजकोषीय तथा मौद्रिक परिस्थितियों में अर्थव्यवस्था लगभग 7.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज कर सकती है।
GDP के नए आंकड़ों को लेकर हालांकि आर्थिक विशेषज्ञों के बीच मतभेद बने हुए हैं। कुछ विशेषज्ञ नई पद्धति और संशोधित आंकड़ों का समर्थन कर रहे हैं, जबकि कुछ पुराने और नए आंकड़ों के बीच बड़े बदलावों को लेकर सवाल उठा रहे हैं। पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति वी. सुब्रमणियन ने भी कहा है कि GDP आंकड़ों में संशोधन बेहतर डेटा और नई पद्धतियों को शामिल करने की सामान्य प्रक्रिया है, इसे अपने आप में आंकड़ों से छेड़छाड़ नहीं माना जाना चाहिए।
इस पूरे विवाद के बीच मुख्य मुद्दा यही है कि भारत की आर्थिक वृद्धि दर को मापने के लिए नई GDP श्रृंखला कितनी बेहतर तस्वीर पेश करती है। मिश्रा का कहना है कि नई पद्धति से वास्तविक आर्थिक गतिविधियों का अनुमान पहले की तुलना में अधिक विश्वसनीय हुआ है, जबकि आलोचक आंकड़ों में हुए बदलावों की व्याख्या को लेकर सवाल उठा रहे हैं। आने वाले महीनों के आंकड़े इस बहस को और स्पष्ट करने में मदद करेंगे।
Poonam Report



