
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बी.आर. गवई ने विष्णु प्रतिमा मामले पर दिए गए अपने बयान को लेकर उठी आपत्तियों पर सफाई दी है। गवई ने कहा कि उनके बयान को गलत संदर्भ में लिया गया है और वह सभी धर्मों का सम्मान करते हैं।
गवई ने स्पष्ट किया, “मैंने कभी किसी धर्म का अनादर नहीं किया। भारत की ताकत ही इसकी विविधता है और न्यायपालिका हमेशा से ही सभी धर्मों और परंपराओं का सम्मान करती आई है। मेरे कथन को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है।”
उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका की भूमिका निष्पक्ष और तटस्थ रहकर सभी समुदायों के अधिकारों और आस्थाओं की रक्षा करना है। न्यायमूर्ति गवई के अनुसार, संविधान का मूल सिद्धांत है कि हर धर्म और हर नागरिक समान है और अदालत इसी मूल भावना के प्रति प्रतिबद्ध है।
इस मामले को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ संगठनों ने गवई के स्पष्टीकरण का स्वागत किया है और कहा है कि इससे स्थिति स्पष्ट हो गई है, जबकि कुछ समूहों का कहना है कि न्यायपालिका से जुड़े लोगों को सार्वजनिक मंचों पर शब्दों का चयन बेहद सावधानी से करना चाहिए ताकि किसी भी धर्म की भावनाएं आहत न हों।
कुल मिलाकर, न्यायमूर्ति गवई ने इस बयान के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की है कि भारतीय न्यायपालिका धर्मनिरपेक्षता की नींव पर खड़ी है और उसका उद्देश्य हर नागरिक को समान सम्मान और न्याय दिलाना है।



