हाईकोर्ट का अहम फैसला:
संदेह के आधार पर नहीं दी जा सकती सजा, दोष सिद्ध करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य जरूरी

हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है
कि किसी भी आरोपी को केवल संदेह के आधार पर दोषी ठहराकर सजा नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि आपराधिक मामलों में सजा देने के लिए अभियोजन पक्ष को ठोस, स्पष्ट और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
न्यायालय ने यह टिप्पणी एक आपराधिक अपील पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें निचली अदालत द्वारा आरोपी को संदेह के आधार पर दोषी ठहराया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि “संदेह कितना भी प्रबल क्यों न हो, वह सबूत का स्थान नहीं ले सकता।” अभियोजन को यह साबित करना होगा कि आरोपी के खिलाफ आरोप संदेह से परे सिद्ध हों।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि गवाहों के बयानों में यदि विरोधाभास हो, जांच में खामियां हों या साक्ष्य परिस्थितिजन्य हों और वे आरोपी की दोषसिद्धि की ओर स्पष्ट रूप से इशारा न करते हों, तो ऐसे मामलों में आरोपी को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है।
हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि
भारतीय न्याय प्रणाली में “सौ दोषी छूट जाएं, लेकिन एक निर्दोष को सजा न हो” का सिद्धांत सर्वोपरि है। इसलिए, अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी है कि वह मामले को पूरी मजबूती के साथ अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे।
इस फैसले को न्यायिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है,
क्योंकि इससे निचली अदालतों को यह स्पष्ट संदेश गया है कि केवल आशंका या अनुमान के आधार पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती।
रिपोर्ट: निरुपमा पाण्डेय
जस्ट एक्शन न्यूज



