‘आग लगी है तभी तो धुआं उठ रहा है’!
शशि थरूर और राहुल गांधी के बीच की कड़वाहट का अब क्या होगा अंजाम?

नई दिल्ली
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कांग्रेस पार्टी के भीतर एक बार फिर अंतर्कलह की आहट तेज होती दिख रही है। वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बीच बढ़ती दूरी अब खुलकर चर्चा का विषय बन गई है। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि “जब धुआं उठ रहा है तो आग कहीं न कहीं जरूर लगी है”—तो क्या कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और विचारधारा को लेकर टकराव गहराता जा रहा है?
दरअसल, हाल के दिनों में शशि थरूर के कुछ बयानों और गतिविधियों को पार्टी लाइन से अलग माना जा रहा है। थरूर जहां बार-बार संगठन में आंतरिक लोकतंत्र, विचारों की स्वतंत्रता और नेतृत्व के सामूहिक मॉडल की बात करते रहे हैं, वहीं राहुल गांधी का फोकस केंद्रीय नेतृत्व और वैचारिक स्पष्टता पर दिखाई देता है। इसी मतभेद को राजनीतिक विश्लेषक दोनों नेताओं के बीच “ठंडी जंग” की संज्ञा दे रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक, शशि थरूर का जी-20, विदेश नीति और कुछ राष्ट्रीय मुद्दों पर सरकार की सराहना करना पार्टी के एक धड़े को रास नहीं आया। वहीं राहुल गांधी के करीबी नेताओं का मानना है कि ऐसे बयान विपक्ष की एकजुटता को कमजोर करते हैं। यही कारण है कि थरूर को कई बार पार्टी के अहम मंचों और रणनीतिक बैठकों से दूर रखा गया।
हालांकि शशि थरूर सार्वजनिक रूप से राहुल गांधी के खिलाफ कोई सीधा बयान देने से बचते रहे हैं, लेकिन उनके संकेतात्मक वक्तव्य और सोशल मीडिया गतिविधियां पार्टी नेतृत्व को असहज करती रही हैं। दूसरी ओर, राहुल गांधी ने भी इस पूरे विवाद पर खुलकर कुछ नहीं कहा है, लेकिन उनके खेमे की नाराजगी अब छुपी नहीं रही।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि कांग्रेस समय रहते इस अंदरूनी मतभेद को नहीं सुलझाती, तो इसका असर आगामी चुनावी रणनीति पर पड़ सकता है। सवाल यह भी है कि क्या शशि थरूर भविष्य में पार्टी के भीतर एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में उभरेंगे, या फिर कांग्रेस नेतृत्व उन्हें साधने में कामयाब होगा?
फिलहाल इतना तय है कि कांग्रेस के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। “आग लगी है तभी तो धुआं उठ रहा है”—और इस आग का अंजाम पार्टी को मजबूत करेगा या और कमजोर, इसका फैसला आने वाला समय करेगा।
रिपोर्ट: निरुपमा पाण्डेय
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