उत्तराखंडबड़ी खबरराज्य

उत्तराखंड के मंडुआ-झंगोरा पर ICMR-NIN की रिसर्च, मोटापे से निपटने में मिलेट्स की भूमिका पर अध्ययन

उत्तराखंड के पारंपरिक अनाज मंडुआ, झंगोरा, चौलाई और कोदा अब वैज्ञानिक शोध के केंद्र में हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पोषण संस्थान (ICMR-NIN), हैदराबाद में इन स्थानीय फसलों के पोषक गुणों और स्वास्थ्य से जुड़े पहलुओं का अध्ययन किया जा रहा है। यह जानकारी ICMR-NIN की निदेशक डॉ. भारती कुलकर्णी ने उत्तराखंड से पहुंचे 15 सदस्यीय मीडिया प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत के दौरान दी।

शोध का उद्देश्य इन पारंपरिक फसलों में मौजूद पोषक तत्वों की वैज्ञानिक जानकारी जुटाना और यह समझना है कि इन्हें संतुलित आहार में किस तरह बेहतर तरीके से शामिल किया जा सकता है। मंडुआ और झंगोरा जैसे अनाज लंबे समय से उत्तराखंड के पारंपरिक भोजन का हिस्सा रहे हैं। अब इनके पोषण संबंधी गुणों को आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों से समझने पर जोर दिया जा रहा है।

ICMR-NIN में रागी यानी फिंगर मिलेट को लेकर भी क्लिनिकल और विश्लेषणात्मक अध्ययन चल रहे हैं। इन अध्ययनों में यह देखा जा रहा है कि रागी के सेवन का एनीमिया में कमी से क्या संबंध हो सकता है। हालांकि शोध अभी जारी है, इसलिए इसके आधार पर किसी निश्चित चिकित्सकीय निष्कर्ष का दावा नहीं किया गया है।

यह शोध ऐसे समय में सामने आया है जब देश में अधिक वजन और मोटापे की समस्या, खासकर बच्चों में, सार्वजनिक स्वास्थ्य की चिंता बन रही है। ICMR-NIN की निदेशक ने इसके पीछे लंबे समय तक बैठे रहने वाली जीवनशैली और वसा, चीनी तथा नमक की अधिक मात्रा वाले खाद्य पदार्थों के सेवन को प्रमुख कारणों में बताया। उन्होंने कहा कि केवल पर्याप्त भोजन उपलब्ध होना ही पोषण सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करता, बल्कि आहार में विविधता और स्वस्थ खान-पान की आदतें भी जरूरी हैं।

संस्थान की ओर से खान-पान से जुड़ी गलत धारणाओं और बिना वैज्ञानिक आधार वाले दावों से बचने पर भी जोर दिया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि मिलेट्स संतुलित आहार का उपयोगी हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन उन्हें संपूर्ण आहार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। संतुलित भोजन में अलग-अलग खाद्य समूहों को उचित मात्रा में शामिल करना जरूरी है।

उत्तराखंड के पारंपरिक अनाजों पर हो रहा यह वैज्ञानिक अध्ययन स्थानीय कृषि और पोषण के बीच संबंध को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि शोध से इनके पोषण संबंधी गुणों और स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर ठोस वैज्ञानिक प्रमाण सामने आते हैं, तो भविष्य में इनके उपयोग और पोषण संबंधी नीतियों को बेहतर दिशा मिल सकती है।

Poonam Report

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button