प्रकृति और संस्कृति के समन्वय से सतत विकास को मिलेगी मजबूती: प्रहलाद पटेल

लखनऊ में तीन दिवसीय ‘प्रकृति–संस्कृति विचार-मंथन’ कार्यक्रम का रविवार को समापन हुआ। इस अवसर पर मंत्री प्रहलाद पटेल ने कहा कि प्रकृति और संस्कृति के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करके जल, भूमि, कृषि, पर्यावरण और ग्रामीण आजीविका से जुड़ी चुनौतियों का समाधान तलाशना जरूरी है। उन्होंने स्थानीय ज्ञान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामुदायिक सहभागिता को साथ लेकर सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ने पर जोर दिया।
11 से 13 सितंबर तक आयोजित कार्यशाला में देश के अलग-अलग राज्यों से आए विद्वानों, किसानों, बीहड़ भूमि पर खेती करने वाले कृषकों और सरकारी संस्थानों के प्रतिनिधियों सहित 100 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। तेलंगाना, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के प्रतिनिधियों ने जल, कृषि, पर्यावरण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सतत विकास से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया।
कार्यशाला में भू-सांस्कृतिक मानचित्र की अवधारणा के तहत सात प्रमुख आयामों पर चर्चा हुई। इनमें भूविज्ञान और धरती, जलविज्ञान एवं जलप्रवाह, कृषि एवं संस्कृति, ग्रामीण अर्थव्यवस्था एवं आजीविका, पारिस्थितिकी एवं जैव विविधता, जलवायु एवं पर्यावरणीय बदलाव तथा भारतीय संस्कृति, परंपरा और प्रकृति संरक्षण जैसे विषय शामिल रहे।
वक्ताओं ने कहा कि भारत की पारंपरिक जीवनशैली में प्रकृति और संस्कृति का गहरा संबंध रहा है। जल संकट, जलवायु परिवर्तन, भूमि क्षरण और ग्रामीण आजीविका जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामुदायिक प्रयासों से जोड़ना जरूरी है।
समापन समारोह में जल संरक्षण और पर्यावरण से जुड़ी पुस्तक ‘बमाया एवं कोटवाली नदी पुनर्जीवन’ का विमोचन भी किया गया। इसमें प्रकृति, संस्कृति, जल संरक्षण, पर्यावरणीय संतुलन, सतत विकास और सूखी नदियों के पुनर्जीवन से जुड़े विषयों को शामिल किया गया है।
कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों ने सुझाव दिया कि भू-सांस्कृतिक दृष्टिकोण को केवल शैक्षणिक चर्चा तक सीमित न रखकर ग्रामीण विकास, जल संरक्षण, कृषि सुधार, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने से जोड़ा जाए। तीन दिनों में मिले सुझावों और निष्कर्षों को संकलित कर संबंधित सरकारी विभागों और सरकार को सौंपने की बात भी कही गई।
Poonam Report



