
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में करीब 28 साल पुराने वांधामा नरसंहार मामले की जांच एक बार फिर शुरू हो गई है। जम्मू-कश्मीर की स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) ने 1998 में हुए इस हत्याकांड को दोबारा जांच के दायरे में लिया है। इस घटना में एक ही रात 23 कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दी गई थी। अब एजेंसी पुराने सबूतों, संदिग्धों और आतंकियों से जुड़े नेटवर्क की नए सिरे से पड़ताल कर रही है।
25 जनवरी 1998 की वह खौफनाक रात
वांधामा नरसंहार 25 जनवरी 1998 को जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले के वांधामा गांव में हुआ था। उस समय घाटी में आतंकवाद अपने चरम दौर में था।
रिपोर्टों के मुताबिक, हथियारों से लैस आतंकियों ने कश्मीरी पंडित परिवारों को निशाना बनाया। हमले में 23 लोगों की मौत हुई, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार मृतकों में 9 महिलाएं और 4 बच्चे थे।
यह हमला गणतंत्र दिवस से ठीक एक दिन पहले हुआ था और इसने पूरे देश को झकझोर दिया था।
घरों में घुसकर बनाया गया निशाना
रिपोर्टों के मुताबिक, हमलावरों ने गांव में कश्मीरी पंडित परिवारों के घरों को निशाना बनाया और गोलीबारी की। इस हमले में चार कश्मीरी पंडित परिवारों के लोग मारे गए थे। घटना के बाद घरों और एक स्थानीय मंदिर में आग लगाए जाने की भी रिपोर्ट सामने आई थी।
वांधामा की यह घटना कश्मीर घाटी में उस दौर में कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाकर की गई हिंसा की भयावह तस्वीरों में से एक मानी जाती है।
28 साल बाद फिर क्यों खुली जांच?
अब SIA ने इस पुराने मामले को दोबारा जांच के दायरे में लिया है। एजेंसी पुराने रिकॉर्ड और उपलब्ध सबूतों की दोबारा समीक्षा कर रही है। साथ ही जांचकर्ताओं की नजर उन लोगों की पहचान पर भी है जो कथित तौर पर इस हमले में शामिल आतंकियों या उनके नेटवर्क से जुड़े हो सकते हैं।
इसका मकसद करीब तीन दशक पुराने मामले में नए सुराग तलाशना और घटना के पीछे जिम्मेदार लोगों तक पहुंचने की कोशिश करना है।
पुराने मामलों की भी दोबारा जांच
वांधामा नरसंहार अकेला मामला नहीं है जिसे SIA नए सिरे से देख रही है। एजेंसी ने आतंकवाद के दौर में कश्मीरी पंडितों की लक्षित हत्याओं से जुड़े कई पुराने मामलों की जांच को फिर से सक्रिय किया है।
इनमें कश्मीरी पंडित नेता टिक्का लाल टपलू, नर्स सरला भट, लेखक सर्वानंद कौल ‘प्रेमी’ और उनके बेटे वीरेंद्र कौल तथा रिटायर्ड जज नीलकंठ गंजू की हत्या से जुड़े मामले शामिल हैं।
जून में दाखिल हुई थी 737 पन्नों की चार्जशीट
वांधामा मामले से जुड़ी जांच में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह भी सामने आया है कि जून 2026 में 737 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की गई थी। इसके बाद मामले की जांच को आगे बढ़ाने और पुराने रिकॉर्ड को फिर से खंगालने की प्रक्रिया तेज हुई है।
अब जांच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इतने वर्षों बाद उपलब्ध सबूतों और नए सुरागों के आधार पर किन लोगों की भूमिका को आगे की कानूनी प्रक्रिया में जोड़ा जा सकता है।
कश्मीरी पंडितों के लिए न्याय की उम्मीद
वांधामा नरसंहार को करीब तीन दशक बीत चुके हैं, लेकिन पीड़ित परिवारों के लिए उस रात की याद आज भी ताजा है। मामले की दोबारा जांच शुरू होने से पीड़ित परिवारों में न्याय की उम्मीद बढ़ी है।
जांच एजेंसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती पुराने मामले में उपलब्ध सबूतों की दोबारा समीक्षा करना और नए सुरागों को कानूनी रूप से स्थापित करना होगी।
कश्मीर में पुराने मामलों पर फिर फोकस
SIA की हालिया कार्रवाई से संकेत मिलता है कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के दौर में हुई लक्षित हत्याओं के पुराने मामलों को फिर से जांच के दायरे में लाया जा रहा है। वांधामा नरसंहार की जांच इसी व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है।
करीब 28 साल बाद इस मामले की फाइल फिर खुलने से अब निगाहें जांच एजेंसी की अगली कार्रवाई पर हैं। यदि जांच में नए और ठोस सबूत सामने आते हैं, तो इस पुराने हत्याकांड में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का रास्ता आगे बढ़ सकता है।
चंदा रिपोर्ट



